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तीनों कृषि कानून की वापसी पर किसकी हुई जीत? डेढ़ साल में क्या-क्या हुआ? जाने किसान आंदोलन से जुड़ी हर एक बात

देश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन देकर तीनों कृषि कानून बिलों को वापस लेने का ऐलान कर दिया। गुरु नानक जयंती थी। इसके साथ साथ प्रधानमंत्री बुंदेलखंड क्षेत्र को तोहफा देने जा रहे थे। लोगों को लगा कि मोदी इसी विषय पर बात करेंगे। लेकिन जब उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन शुरू किया और तीनों कृषि क़ानून को वापस लेने की बात कही तो सभी चौक गए। किसानों के चेहरों पर खुशियां दौड़ गई। सोशल मीडिया इसी खबर से भर गया। लोग किसानों और किसानों के नेता राकेश टिकैत को भर भर के बधाइयां देने लगे। कोई कह रहा था कि यह जीत किसानों की है, तो कोई लिख रहा था कि राकेश टिकैत की मेहनत रंग लाई, तो किसी ने लिखा किसानों के आगे झुक गई सरकार, तो किसी ने लिखा झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए। सब खुलकर अपने अपने विचार सोशल मीडिया पर रख रहे हैं। आखिर सरकार ने तीनों कृषि कानून बिलों को वापस क्यों लिया? इसके पीछे की वजह क्या है? क्या सरकार ने किसानों के दबाव में आकर कृषि कानून बिलों को वापस लिया या फिर सरकार को इन बिलों को वापस लेना मजबूरी थी.

चलिए आपको बताते हैं कहानी कब शुरू हुई। कैसे कहानी लड़ी गई और फिर अंत में कैसे और किस वजह से सरकार ने तीनों कृषि कानून बिलों को वापस ले लिया। कहानी की जगह आप और भी किसी शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं।

तारीख थी17 दिसंबर वर्ष था 2020। लोकसभा ने 3 नए कृषि कानूनों को पास किया।
इसी के 2 दिन बाद यह बिल राज्यसभा में पेश किया गया और 20 सितंबर 2020 को भारी हंगामे के साथ सरकार ने आखिरकार तीन में से दो कृषि कानूनों को पारित करा दिया और बचा तीसरा कानून ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन 1955’ जिसे 22 सितंबर को भी राज्यसभा से मंजूरी मिल गई।
27 सितंबर 2020 को भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर होते हैं यह तीनों विधेयक कानून बन गए।

किसान और विपक्ष के नेताओं ने तीनों कृषि कानून बिलों का विरोध किया। सरकार नहीं मानी तो किसानों ने आंदोलन का रास्ता अपनाया। किसानों के आंदोलन को देखते हुए सरकार ने 14 अक्टूबर 2020 को किसानों को बात करने के लिए बुलाया लेकिन किसानों ने इसका विरोध किया।

13 नवंबर को सरकार और किसानों के बीच तीनों नए कृषि कानून को लेकर बात होनी थी इस मीटिंग में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर नहीं गए उनकी जगह कृषि सचिव पहुंचे।

सरकार और किसान अपनी अपनी बातें रख रहे थे। किसानों को विपक्ष और कई राजनीतिक पार्टियों का सपोर्ट था। देखते ही देखते 24 नवंबर को किसानों ने 500 अलग-अलग संगठनों को मिलाकर किसान संयुक्त मोर्चा का गठन कर दिया। और देखते ही देखते किसानों ने संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में 25 नवंबर को पंजाब और हरियाणा के किसानों ने दिल्ली के लिए कूच कर दी।

किसान दिल्ली बॉर्डर पर जमा हो गए पुलिस ने किसानों को दिल्ली में घुसने से रोका। तारीख 26 नवंबर तक पहुंच चुकी थी ना तो सरकार पीछे हटी थी और ना ही किसानों अपना आंदोलन बंद किया था। किसान सिंधु बॉर्डर पर ही डटे‌ रहे।

सरकार की तरफ से फरमान आ चुका था 1 दिसंबर 2020 को किसान नेता और सरकार के बीच बातचीत होनी थी। 1 दिसंबर को किसान नेताओं और सरकार के बीच तीसरे दौर की बात हुई कृषि कानूनों को लेकर सरकार ने एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुझाव दिया। बात नहीं बनी फिर 3 दिसंबर 2020 को किसान नेताओं सरकार के बीच करीब 7 घंटे तक बातचीत हुई। किसानों को डर था कि सरकार कहीं इन तीन नए कृषि कानूनों के जरिए एमएसपी यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस खत्म न कर दे सरकार ने किसानों से वादा किया कि हम एमएसपी से कोई छेड़छाड़ ही नहीं करेंगे लेकिन किसान नहीं माने उनका कहना था कि आप तीनों कानूनों को रद्द करें।

अब किसानों का आंदोलन तेज हो चुका था सरकार लगातार किसान नेताओं से बातचीत कर रही थी बात नहीं बन रही थी कड़ाके की ठंड आ चुकी थी किसान टेंट लगाकर सड़कों पर आंदोलन कर रहे थे।
देखते ही देखते ही 11 दिसंबर आ चुका था। किसानों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में कृषि कानूनों कानून बिलों को रद्द करने की मांग को लेकर याचिका दायर की गई।

देश के कोने कोने से किसान आकर आंदोलन को बड़ा और तेज करने लगे। इन सबके बीच प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री और अन्य मंत्री विपक्ष पर निशाना साधते हुए किसानों को कृषि कानून बिल के बारे में बताया उन्हें समझाना चाहा कि यह कानून आपकी हित में है लेकिन किसानों को नहीं समझ आ रहा था। और उधर विपक्षी पार्टियां सरकार पर लगातार वार पर वार किए जा रही थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी विधानसभा में तीनों कृषि कानूनों का कड़ा विरोध किया उन्होंने तीनों कृषि कानून बिलों की प्रतियां फाड़ते हुए जय जवान जय किसान का नारा लगाया। चिंगारी पूरे देश में फैल चुकी थी स्कूल और कॉलेज बंद हो चुके थे जगह-जगह धरना प्रदर्शन शुरू हो गए थे।

आंदोलन चलता रहा। किसान डटे‌ रहे। 2020 से हम 2021 में आ चुके थे। और 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई। माननीय इन तीनों कानूनों पर रोक लगाएं नहीं तो हमें ही कुछ करना होगा। फिर अगले दिन यानी 12 जनवरी 2021 को उच्चतम न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा दी और 4 सदस्य कमेटी की घोषणा की।

4 सदस्य कमेटी ने 31 मार्च को बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

देखते ही देखते 2021 आधा बीत चुका था। कई घटनाएं हो चुकी थी सैकड़ों किसान शहीद हो चुके थे। लाल किले में भी उपद्रव हो चुका था। सब कुछ हो गया था और इधर राकेश टिकैत राष्ट्रीय चेहरा बन चुके थे। देखते ही देखते टिकैट की पहुंच और पावर बढ़ गई थी। टिकैत किसानों के चहेते बन चुके थे। साथ ही साथ हर मुद्दे पर अपना विचार रख रहे थे। कुछ आंकड़ों के मुताबिक इस आंदोलन में लगभग 605 किसानों ने अपना बलिदान दिया है।

देखते ही देखते हम आज के दिन में पहुंच गए या नहीं 19 नवंबर 2021। ‌ अब तक बहुत कुछ घटित हो चुका था। खूनी संघर्ष से लेकर पुलिस, जनता, किसान, देश नेता, राजनीति, हर एक शब्द किसान आंदोलन का हिस्सा बन चुके थे। 19 नवंबर 2021 की सुबह 9:00 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन दिया संबोधन में उन्होंने किसानों से माफी मांगते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि हम किसानों को समझाने में नाकाम नहीं अब किसान बॉर्डर छोड़कर आंदोलन छोड़कर वापस अपने खेतों में जाएं खेती करें। डेढ़ साल में सब कुछ बदल गया जो कृषि कानून सरकार ने संसद से पारित किया था अब उसे रद्द करने का ऐलान कर चुकी है अब देखते हैं कि कृषि कानून कब रद्द किए जाएंगे क्योंकि राकेश टिकैत ने तो साफ कह दिया है कि जब तक संसद इन कानूनों को रद्द नहीं करती तब तक हम आंदोलन करते रहेंगे।

अब बात करते हैं कि आखिर जीता कौन। देखिए साफ शब्दों में कहेंगे तो यहां पर जीत किसानों की हुई है, किसानों के नेता राकेश टिकैत की हुई है, लोकतंत्र की जीत हुई है, गणतंत्र की जीत हुई है, जनतंत्र की जीत हुई है। क्यों पहले हिंदुस्तान की जीत हुई है लेकिन सबके लिए जीत का मतलब अलग अलग है। सोशल मीडिया पर नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह चाल चली है। दूसरे बीजेपी के सपोर्टर नरेंद्र मोदी के चाहने वाले उनसे नाराज हैं बीजेपी आईटी सेल भी मौन है। बीजेपी और नरेंद्र मोदी के चाहने वाले उन्हीं से सवाल पूछ रहे हैं, क्योंकि औरों को बताने के लिए उनके पास जवाब ही नहीं है। अब सब कुछ शुरू हो चुका है देखते हैं कब तक चलता है आप भी बता सकते हैं कि आखिर सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किस लिए या किस कारण से या किसकी वजह से इन कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है।

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